Tuesday, 12 December 2017

पापा और हार्ट अटैक (26/09/2016)

चलते खेल में जब पर्दा गिरने लगता है
जीवन घने अंधेरों से घिरने लगता है

अब तुम्हे कौन बताये के तुम कितना जरुरी हो
तुम्हारे साथ कोई भी तो हसरत नही जो अधूरी हो

यूँ टूटती डोर में आँसू बहने लगते है
पत्थर से दिखने वाले लोग ढहने लगते है

मैं कायर जानता ही क्या हु सिवाये हंसने के
मुझ में हुनर ही नही रो देने के सिसकने के

ये भी तो एक रंग ही था जीवन के खजाने का
बहुत भयानक है, ख्याल भी तेरे जाने का


संजीव (27/09/2016; 01:48 am)
रविंद्रा हॉस्पिटल हिसार

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