उसने झुन्झुलाते हुए कहा “अब रख भी दो किताब रात के 2 बजे हुए है”
किताबे से उसके चहरे तक जाते हुए मैंने कहा “.........................................मेरे पास और है ही क्या”
मेरी तन्हाई में डूबी हुई नजरें उसकी नींद से भरी आँखों में घुलते हुए मेरी सच्चाई बयाँ कर रही थी, भावनाओं के समुंदर में उफान के साथ मैं बड़ी उम्मीद से अपनी किसी नई रचना के लिए उसके जवाब की तालाश में था |
जवाब आ गया |
“सुनो ! कम से कम लाइट तो बंद कर दो “
मैं उसे समझाना चाहता हूँ की इस आधुनिक युग में किताबों ने अपना अस्तित्व बचा रखा है और इस किताब के चलते इस लाइट को इतना मान सम्मान बख्शा गया है, अँधेरे में पढने वाली तकनीक अभी मेरे अंदर जगह बना नही पाई है | खैर छोड़ों इतनी रात को क्या विज्ञानिक बनना, पाठक से लेखक बनना ही बहुत मुश्किल प्रक्रिया है |
“अँधेरे में मैं खुद को पढने लगता हूँ, फिर सोचता हूँ हज़ार कमियां है मुझे में कुछ ऐसा क्यों न पढू जिसमे कोई कमी नही है”
मुहँ बनाते हुए जवाब आया “अजीब मुसीबत है|”
“उन्हीं से पार पाने की कोशिश है ये, मुन्सी प्रेम चंद ने आज से 100 साल पहले जो लिखा वो आज भी सच है, मैं अगले 10 दिन भी सोच पाऊ तो गज़ब हो जाएगा”
ताना कसते हुए एक और जवाब आया “गज़ब तब होगा जब सुबह ऑफिस के समय तक सोते रह जाओगे”
“सो तो मैं सालों से रहा हूँ , किसी ऐसे छंद की तलाश में हूँ जो जगा दे मुझे”
“मिले तो मुझे भी बताना, सुबह आपको जगाने के लिए पढ़ दूंगी”
पत्नी जी अब सो चुकी है मैं विचार में हूँ, रात सिर्फ सोने के लिए थोड़े है यही तो वो समय है जब मैं खुद को अपने करीब महसूस करता हूँ, ये सरपट दौड़ता जीवन मुझे कहा लेकर जाएगा?
शायद मुझ से कोसों दूर जहाँ मैं खुद को सुन ना पाउँगा | जीवन की इस भाग दौड़ से भरी सोच से पलके भारी होनी शुरू हो गई |
करवट बदलते हुए उसने फिर कहा “लाइट बंद कर दो”
संजीव
Badiya ����
ReplyDeleteNice lines...
ReplyDeleteचिर सजग आँखें उनींदी.... आज कैसा व्यस्त बाना
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