Sunday, 16 October 2022

शायर


थे ख़्वाब बहुत जीवन में सजाने को
तुमने चुने तीर मेरे ज़ख्म सुलगाने को

पहुँच पायेगा ना जो अब किसी अंजाम तलक
अधूरा छोड़ चला हूँ मैं उस फसाने को

तुमने पढ़ा ही नही जो लिखा था तुम्हारे लिए
दुनिया शायर कहती है अब तेरे दीवाने को

वो एक शख़्श


अब कहाँ हम अपने दुख किसी से कह सकते हैं

अब कहाँ हम किसी के आंसुओं में बह सकते हैं

वो बातें अब बीते जमाने सी लगती हैं

उन बातों को अब हम कहानियाँ कह सकते हैं

अब सोचने पर भी उसका चेहरा याद नहीं आता

उसने ही कहा था हम दोस्त तो रह सकते हैं

राहुल


कहा से शुरू किया जाए ये ठीक वैसा ही प्रश्न है कि कहा से शुरू हुआ था, हज़ारों मील लम्बा सफर साथ तय करने के बाद आज वक़्त के हाशिये पर खड़े है अनगिनत यादों के साथ

जीवन के ना जाने कितने ही रंग हम ने साथ मे देखें है
उन पलों की यादें भी साथ है जहां पहुँच कर लगा कि अब इस से आगे जीवन है ही नही,
हमने साथ मे देखा है अजीज लोगों को जाते हए दुनिया से, हमारी दुनिया से

हम है गवाह सैंकडों लोगों की बर्बादी भरे जश्न के, 
हम गिन नही पाएंगे साथ मे पिये गए चाय के कप

जहाँ से हम चले वहाँ हमारे साथ कुछ लोग थे जहाँ हम है वहाँ भी हमारे साथ कुछ लोग है लेकिन सब अलग

इस अथाह समंदर से फैले जीवन मे सब बदला बस नाख़ुदा ना बदला

सीमाओं से परे इस सफर पर हमारी यात्रा बदस्तूर जारी है 

जारी रहेगी
सांस रहे ना रहे यारी रहेगी

संजीव "राहुल"

चाँदनी रात का अंधेरा


चाँदनी रात में साहिल पर खड़ी टूटी कश्ती
बस इतनी सी ही है मेरी हस्ती

दूर से रोशनी नसीब हो रही है,
सन्नाटों से लिपटी मेरी रूह रो रही है

हिलते पानी में हिल रहा है शरीर
खो चुका हूँ मैं खुद को, सो रहा है जमीर

अब आएगी एक लहर और डूबा देगी मुझे
यूँ ना उम्मीद होने की कुदरत सजा देगी मुझे

बर्फ ओढ़ें है आग, कुछ देर में मेरा दम निकलेगा
ये आखरी रात कटी तो पहला दिन निकलेगा

फिर कुछ रात मैं सो नही पाऊंगा


फिर किसी रोज सोचूंगा मैं तुम्हारे बारें में
फिर किसी रात तुम्हारा ख़्वाब सजाऊंगा

फिर कुछ रात मैं सो नही पाऊंगा.........

मैं करूँगा याद उस दिन को भी जब तू नही था
मैं खुद भी तुम्हारे होने तलक की गई उदेड बुन में ही था

मैं मैं ना हो पाया उसके बाद कभी
मैं खुद को ढूंढता रहता था तुम्हारे साथ भी

एक बार मिलना एक बार फिर मिलना
कभी ना खत्म होने वाला सिलसिला खत्म होना ही था

ये ठीक वैसा ही था जैसे लहरों ने कहा दिया किनारों से
कि अब आ नही पाएंगी वो 

भला लहरे कब किनारों का दामन छोड़ पाती है
मगर इस बार ये भी हुआ

मुझे अब तुम्हारे साथ साथ खुद की भी कमी खलती है
कश्तियाँ अब सिर्फ हवा के सहारे चलती है

इस बहती हवा में एक दिया जलाऊंगा
फिर कुछ रात मैं सो नही पाऊंगा
सवाल 

ये सवाल भी कितना अजीब सवाल है
महोब्बत है या नही अजीब बवाल है

एक दिन सोचने बैठों दुनिया भर की बातें
गिले शिकवें शिकायतें, रो कर कटी रातें

यूँ लगता है कि हम तुम कहीं है ही नही
जो चल रहा है बस चल रहा है गलत या सही

यूँहीं बसर हो जाती गर तुम्हारे ना होने से
तो किसने रोका था मुझे रात भर सोने से

तेरे संग चल नही पाऊंगा तो भागूँगा कैसे
तेरे बिन सो नही पाऊंगा तो जागूँगा कैसे

मैं जागना चाहता हूँ मुझे सिर्फ सोने ना दे
मुझे ढूंढ ले फिर एक बार मुझे खोने ना दे

संजीव

Sunday, 20 January 2019

"तुम"

सही कह रहे हो तुम
मेरी रागों में बह रहे हो तुम,
मुझे बना चुके हो आशियाँ अपना
मेरे दिल मे रह रहे हो तुम


मैं कहीं खो जाना चाहूं
तेरी गोद मे रख सर सो जाना चाहूं
जमाने भर से तोड़ के रिश्ते
सिर्फ तुझे ही पाना चाहूँ


ये दर्द, ये सजा ये जश्न ये मजा
सब इश्क़ में सह रहे हो तुम
सही कह रहे हो तुम
मेरी रागों में बह रहे हो तुम


रूठ जाओ अगर तो ये जीवन वीरान
जो हंस दो तो फिर खिलखिलाए जहान

जो ना मिलने दे मुझे तुझ से
वो सब मेरे लिए सिर्फ शमशान


तू हो हर जगह, तू हो हर सुबह
तू जो ना हो तो मेरी सोचें परेशान


जो कहना चाहते हो मुझ से
सिर्फ खुद से कह रहे हो तुम
मुझे बना चुके हो आशियाँ अपना
मेरे दिल मे रह रहे हो तुम


सही कह रहे हो तुम
मेरी रागों में बह रहे हो तुम