Sunday, 16 October 2022

फिर कुछ रात मैं सो नही पाऊंगा


फिर किसी रोज सोचूंगा मैं तुम्हारे बारें में
फिर किसी रात तुम्हारा ख़्वाब सजाऊंगा

फिर कुछ रात मैं सो नही पाऊंगा.........

मैं करूँगा याद उस दिन को भी जब तू नही था
मैं खुद भी तुम्हारे होने तलक की गई उदेड बुन में ही था

मैं मैं ना हो पाया उसके बाद कभी
मैं खुद को ढूंढता रहता था तुम्हारे साथ भी

एक बार मिलना एक बार फिर मिलना
कभी ना खत्म होने वाला सिलसिला खत्म होना ही था

ये ठीक वैसा ही था जैसे लहरों ने कहा दिया किनारों से
कि अब आ नही पाएंगी वो 

भला लहरे कब किनारों का दामन छोड़ पाती है
मगर इस बार ये भी हुआ

मुझे अब तुम्हारे साथ साथ खुद की भी कमी खलती है
कश्तियाँ अब सिर्फ हवा के सहारे चलती है

इस बहती हवा में एक दिया जलाऊंगा
फिर कुछ रात मैं सो नही पाऊंगा

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