चाँदनी रात का अंधेरा
चाँदनी रात में साहिल पर खड़ी टूटी कश्ती
बस इतनी सी ही है मेरी हस्ती
दूर से रोशनी नसीब हो रही है,
सन्नाटों से लिपटी मेरी रूह रो रही है
हिलते पानी में हिल रहा है शरीर
खो चुका हूँ मैं खुद को, सो रहा है जमीर
अब आएगी एक लहर और डूबा देगी मुझे
यूँ ना उम्मीद होने की कुदरत सजा देगी मुझे
बर्फ ओढ़ें है आग, कुछ देर में मेरा दम निकलेगा
ये आखरी रात कटी तो पहला दिन निकलेगा
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