Sunday, 16 October 2022

सवाल 

ये सवाल भी कितना अजीब सवाल है
महोब्बत है या नही अजीब बवाल है

एक दिन सोचने बैठों दुनिया भर की बातें
गिले शिकवें शिकायतें, रो कर कटी रातें

यूँ लगता है कि हम तुम कहीं है ही नही
जो चल रहा है बस चल रहा है गलत या सही

यूँहीं बसर हो जाती गर तुम्हारे ना होने से
तो किसने रोका था मुझे रात भर सोने से

तेरे संग चल नही पाऊंगा तो भागूँगा कैसे
तेरे बिन सो नही पाऊंगा तो जागूँगा कैसे

मैं जागना चाहता हूँ मुझे सिर्फ सोने ना दे
मुझे ढूंढ ले फिर एक बार मुझे खोने ना दे

संजीव

Sunday, 20 January 2019

"तुम"

सही कह रहे हो तुम
मेरी रागों में बह रहे हो तुम,
मुझे बना चुके हो आशियाँ अपना
मेरे दिल मे रह रहे हो तुम


मैं कहीं खो जाना चाहूं
तेरी गोद मे रख सर सो जाना चाहूं
जमाने भर से तोड़ के रिश्ते
सिर्फ तुझे ही पाना चाहूँ


ये दर्द, ये सजा ये जश्न ये मजा
सब इश्क़ में सह रहे हो तुम
सही कह रहे हो तुम
मेरी रागों में बह रहे हो तुम


रूठ जाओ अगर तो ये जीवन वीरान
जो हंस दो तो फिर खिलखिलाए जहान

जो ना मिलने दे मुझे तुझ से
वो सब मेरे लिए सिर्फ शमशान


तू हो हर जगह, तू हो हर सुबह
तू जो ना हो तो मेरी सोचें परेशान


जो कहना चाहते हो मुझ से
सिर्फ खुद से कह रहे हो तुम
मुझे बना चुके हो आशियाँ अपना
मेरे दिल मे रह रहे हो तुम


सही कह रहे हो तुम
मेरी रागों में बह रहे हो तुम

Wednesday, 5 December 2018

रात (RAAT)




मैं हूँ मुतमईन कि तुम सिर्फ मेरे हो,
तुम्हें देना है जवाब पूरी कायनात को

सहर होने के वादे मुझे मंज़ूर नही,
बड़ी मुश्किल से मनाया है इस रात को

चारसाजों की चारसाजी मेरे किस काम की,
हा तुम समझ सकते हो, बिगड़े हुए हालात को



Wednesday, 24 October 2018

गैरमौजूदगी

तुम्हारे ना होने से तबियत नासाज़ लगती है
तुम्हारे ना होने से कयामत आज लगती है

फिर क्यूँ नही हो तुम

सदा से गूँजते सन्नाटे में आवाज तुम्हारी आती है
तुम सामने बैठो फिर भी याद तुम्हारी आती है

फिर क्यूँ हो तुम

तुम्हारा होना भी आंसुओं से सराबोर करता है
तुम्हारे ना होने के ख़्वाब से दिल बहुत डरता है

तुम्हारे बारे में वक़्त को एक बात समझाई जाए
तुम्हारी गैरमौजूदगी में मेरी उम्र ना बढ़ाई जाए

क्योंकि तुम्हारे होने से जीना शुरू होता है
मैं कहीं भी हूँ मेरे साथ तू होता है

Tuesday, 12 December 2017

पापा और हार्ट अटैक (26/09/2016)

चलते खेल में जब पर्दा गिरने लगता है
जीवन घने अंधेरों से घिरने लगता है

अब तुम्हे कौन बताये के तुम कितना जरुरी हो
तुम्हारे साथ कोई भी तो हसरत नही जो अधूरी हो

यूँ टूटती डोर में आँसू बहने लगते है
पत्थर से दिखने वाले लोग ढहने लगते है

मैं कायर जानता ही क्या हु सिवाये हंसने के
मुझ में हुनर ही नही रो देने के सिसकने के

ये भी तो एक रंग ही था जीवन के खजाने का
बहुत भयानक है, ख्याल भी तेरे जाने का


संजीव (27/09/2016; 01:48 am)
रविंद्रा हॉस्पिटल हिसार

Wednesday, 29 November 2017

कला और विज्ञान

उसने झुन्झुलाते हुए कहा “अब रख भी दो किताब रात के 2 बजे हुए है”

किताबे से उसके चहरे तक जाते हुए मैंने कहा “.........................................मेरे पास और है ही क्या”

मेरी तन्हाई में डूबी हुई नजरें उसकी नींद से भरी आँखों में घुलते हुए मेरी सच्चाई बयाँ कर रही थी, भावनाओं के समुंदर में उफान के साथ मैं बड़ी उम्मीद से अपनी किसी नई रचना के लिए उसके जवाब की तालाश में था |
जवाब आ गया |

“सुनो ! कम से कम लाइट तो बंद कर दो “

मैं उसे समझाना चाहता हूँ की इस आधुनिक युग में किताबों ने अपना अस्तित्व बचा रखा है और इस किताब के चलते इस लाइट को इतना मान सम्मान बख्शा गया है, अँधेरे में पढने वाली तकनीक अभी मेरे अंदर जगह बना नही पाई है | खैर छोड़ों इतनी रात को क्या विज्ञानिक बनना, पाठक से लेखक बनना ही बहुत मुश्किल प्रक्रिया है |

“अँधेरे में मैं खुद को पढने लगता हूँ, फिर सोचता हूँ हज़ार कमियां है मुझे में कुछ ऐसा क्यों न पढू जिसमे कोई कमी नही है”

मुहँ बनाते हुए जवाब आया “अजीब मुसीबत है|”

“उन्हीं से पार पाने की कोशिश है ये, मुन्सी प्रेम चंद ने आज से 100 साल पहले जो लिखा वो आज भी सच है, मैं अगले 10 दिन भी सोच पाऊ तो गज़ब हो जाएगा”

ताना कसते हुए एक और जवाब आया “गज़ब तब होगा जब सुबह ऑफिस के समय तक सोते रह जाओगे”

“सो तो मैं सालों से रहा हूँ , किसी ऐसे छंद की तलाश में हूँ जो जगा दे मुझे”

“मिले तो मुझे भी बताना, सुबह आपको जगाने के लिए पढ़ दूंगी”

पत्नी जी अब सो चुकी है मैं विचार में हूँ, रात सिर्फ सोने के लिए थोड़े है यही तो वो समय है जब मैं खुद को अपने करीब महसूस करता हूँ, ये सरपट दौड़ता जीवन मुझे कहा लेकर जाएगा?
शायद मुझ से कोसों दूर जहाँ मैं खुद को सुन ना पाउँगा | जीवन की इस भाग दौड़ से भरी सोच से पलके भारी होनी शुरू हो गई |

करवट बदलते हुए उसने फिर कहा “लाइट बंद कर दो”


संजीव

Tuesday, 18 December 2012

She iz mine

Jo pari si bani mere khayalo pe chhai thi..
Bas kuch din pahle dulhan ban mere ghar aai thi..


Uska mere sath hona bahut pyara ahsaas hai..
in khas logo ki bhid me wo sab se khas hai..


Mere liye wo yun hai jaise barso purana naata hai..
Rishto ko jeena use bhi khub aata hai...


Dekhu gar gaur se use..parchai tumhari dikhti hai...
Maa, Mujhe teri bahu bahut pyaari lagti hai